पुराना बॉलीवुड मेरे लिए सिर्फ़ संगीत या सिनेमा नहीं है; दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यह एक छोटी, निजी सूची है—उन गीतों और फ़िल्मों की, जिनकी ओर मैं बार-बार लौटता हूँ।
संगीत
पुराने फ़िल्मी गीतों में किशोर कुमार मेरी सबसे स्वाभाविक शुरुआत हैं। उनकी आवाज़ में शरारत भी है, उदासी भी और एक ऐसी सहजता भी, जो हर बार नई लगती है।
बर्मन परिवार
पुराने फ़िल्मी संगीत में मैं सबसे अधिक सचिन देव बर्मन की धुनों की ओर लौटता हूँ। उनकी सादगी, लोक-संगीत की खुशबू और भावों की गहराई हर गीत को अलग बनाती है। बंदिनी का “मेरे साजन हैं उस पार” मेरे लिए उनका एक खास गीत है—धीमा, उदास और बेहद सुंदर। गाइड का “वहाँ कौन है तेरा” भी उतना ही अपना लगता है—एक सरल, आत्मीय पुकार जो देर तक साथ रहती है। प्यासा का “ये दुनिया अगर मिल भी जाए” अपनी बेचैनी और तीखे सवालों के कारण भूलना मुश्किल है।
फिर आते हैं राहुल देव बर्मन, यानी पंचम। उनकी धुनों में प्रयोग, चंचलता और एक अनोखी गर्माहट है। आशा भोसले की बेबाक आवाज़ और किशोर कुमार की खेलती हुई अदायगी के साथ उनका संगीत इस सूची का एक ज़रूरी हिस्सा है।
फ़िल्में
मुझे ऐसी बॉलीवुड कॉमेडी और फ़िल्में पसंद हैं जिन्हें बार-बार देखा जा सके। शुरुआत के लिए ये भरोसेमंद जगहें हैं:
- ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्में
- गाइड
- आनंद
- शोले
- अंदाज़ अपना अपना
- पीकू
ये कोई रैंकिंग नहीं है—बस वे फ़िल्में हैं जिनकी ओर मैं खुशी-खुशी फिर लौट आता हूँ।